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Badrinath Temple History in Hindi 2022 – बद्रीनाथ की रोचक बाते

Badrinath Temple History in Hindi: हिन्दुओं के चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम Badrinath Temple भगवान विष्णु का निवास स्थल है यह भारत के उत्तरांचल राज्य में अलकनंदा नदी के बायें तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणी के बीच स्थित है। गंगा नदी की मुख्यधारा के किनारे बसा यह तीर्थ हिमालय में समुद्र तल से 3050 मीटर की उचाई पर स्थित है।

Mystery of Badrinath Temple

हिंदू के चार धाम (Char Dham ki yatra ke bare mein) तीर्थ स्थल के नाम है बद्रीनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ और रामेश्वर। ये चार धाम प्रमुख हैं, लेकिन जब व्यक्ति वृंदावन दर्शन करने जाता है तो उसे गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ के दर्शन भी करना चाहिए।

इन चारों को मिलाकर छोटा चारधाम कहा गया है। केदारनाथ को जहा भगवान शंकर का आराम करने का स्थान माना गया है। वहीं बद्रीनाथ Badrinath Temple को सृष्टि का आठवां वैकुंठ कहा गया है, जहा भगवान विष्णु Lord Vishnu छे माह निद्रा में रहते हैं और छह माह जागते हैं।

यहाँ बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई है। चतुर्भुज ध्यान मुद्रा में है। यहाँ नर नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।

Badrinath Dham lord Vishnu Image
Badrinath Dham: Badrinath Temple main Gate and lord Vishnu Image

बद्रीनाथ का नाम इसलिए बद्रीनाथ है क्योंकि यहाँ प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जंगली बेरी को बद्री कहते हैं। इसी कारण इस धाम का नाम बद्री पड़ा।

यहाँ भगवान विष्णु का विशाल मंदिर है और यह संपूर्ण क्षेत्र प्रकृति की गोद में स्थित है। केदारघाटी में दो पहाड़ है, नर और नारायण पर्वत विष्णु के 24 अवतारों में से एक नर और नारायण ऋषि की है। तपोभूमि है उनके तप से प्रसन्न होकर केदारनाथ में शिव प्रकट हुए थे।

बद्रीनाथ की कथा – Badrinath Temple History in Hindi

दूसरी ओर बदरीनाथ धाम में जब भगवान विष्णु विश्राम करते हैं, कहते हैं कि सतयुग में बदरीनाथ धाम की स्थापना नारायण ने की थी। भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के बाद बद्री क्षेत्र में भगवान नर नारायण के दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन मुक्ति प्राप्त हो जाती है। इसी अशिव शिव पुराण के कोटिरुद्रसंहिता में व्यक्त किया गया है।

पुराण अनुसार भूकंप, जलप्रलय और सूखे के बाद गंगा लुप्त हो जाएगी और इसी गंगा की कथा के साथ जुड़ी हैं। बदरीनाथ और केदारनाथ तीर्थ स्थल की रोचक कहानी। भविष्य में नहीं होंगे बदरीनाथ के दर्शन क्योंकि माना जाता है कि जिसदिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे बद्रीनाथ का मार्ग। पूरी तरह बंद हो जाएगा।

भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्य वृद्धि नामक 1 तीर्थ का उगम होगा। यह भी मान्यता है कि जोशीमठ स्थित नृसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल दर साल पतला होता जा रहा है। जिसदिन हाथ लुप्त हो जाएगा। उस दिन बद्री और केदारनाथ तीर्थ स्थल विलुप्त होना प्रारंभ हो जाएंगे।

मंदिर में बद्रीनाथ के दाहिने और कुबेर की मूर्ति भी है। उनके सामने उद्धवजी है तथा उत्सव मूर्ति है। उत्सव मूर्ति शीतकाल में बर्फ़ जमने पर जोशीमठ में ले जाई जाती है। उद्धव जी के पास ही चरण पादुकाएं भाई और नर नारायण की मूर्ति है।

Badrinath Height

इनके समीप ही श्रीदेवी और भूदेवी है। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3133 मीटर की उचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य आठवीं शताब्दी के दर्शनिक एक संत ने इनका निर्माण कराया था।

इसके पश्चिम में 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर की ऊँचाई Height of Badrinath 7138 मीटर है। बदरीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बद्रीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल रहा है। बदरीनाथ में अन्य कई प्राचीन स्थल हैं। जैसे अलकनंदा के तट पर स्थित अद्भुत गर्म झरना, जिसे तप्त कुंड Tapt kund badrinath kedarnath कहा जाता है या समतल चबूतरा, जिसे ब्रह्म कपाल कहा जाता है।

Tapt kund badrinath kedarnath
Tapt kund badrinath kedarnath

पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक सांप शिला है, शेषनाग की कथित छांव वाला एक शिलाखंड शेष नृत्य है, भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं। चरणपादुका बद्रीनाथ से नजर आने वाला पर फिर से ढका ऊंचा शिखर नीलकंठ, जो गढ़वाल क्वीन के नाम से जाना जाता है।

Badrinath mandir History in Hindi

पौराणिक कथाओं और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार यहाँ नीलकंठ पर्वत NeelKanth Peek Badrinath Dham के समीप भगवान विष्णु ने बालरूप में अवतरण किया था। कहते हैं कि भगवान विष्णु जी अपने ध्यानयोग और विश्राम हेतु एक उपयुक्त स्थान खोज रहे थे और उन्होंने अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भाग गया।

NeelKanth Peek Badrinath Dham
NeelKanth Peek Badrinath Dham

उस वक्त यह स्थान भगवान शंकर और पार्वती का निवास स्थान था। ऐसा विश्व में एक युक्ति सोचीं 1 दिन शिव और पार्वती भ्रमण के लिए बाहर निकलें। और जब वे वापस लौटे तो उन्होंने द्वार पर एक नन्हे शिशु को रोते हुए देखा। माता पार्वती की ममता जाग उठी। वह शिशु को उठाने लगी तभी शिव ने रोका और कहा कि वो शिशु को मत छूना पार्वती ने पूछा क्यों? शिव बोले ये कोई अच्छा शिशु नहीं है. सोचो के यहाँ अचानक कैसे और कहाँ से आ गया दूर तक कोई उसके माता पिता नजर नहीं आते, यह कोई बच्चा नहीं बल्कि मायावी लगता है।

लेकिन माता पार्वती नहीं मानी और वह बच्चे को उठाकर घर के अंदर ले गई। पार्वती ने बच्चे को चुप कराया और उसे दूध पिलाया। फिर वह बच्चे को वही सुलाकर शिव के साथ नजदीक के गर्म झरने में स्नान करने के लिए चली गई। जब वे दोनों वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि घर का दरवाजा अंदर से बंद था। पार्वती ने शिव से कहा कि अब हम क्या करें? शिव ने कहा कि यह तुम्हारा बालक है, मैं कुछ नहीं कर सकता।

अच्छा होगा कि हम कोई नया ठिकाना ढूंढ ले क्योंकि अब दरवाजा नहीं खुलने वाला पर मैं बलपूर्वक इस दरवाजे को नहीं खोलूंगा। शिव और पार्वती व स्थान छोड़कर केदारनाथ चले गए। वो बालक भगवान विष्णु थे, वहीं जमे रहे इस तरह भगवान विष्णु ने जबरन बद्रीनाथ को अपना विश्राम स्थल बना लिया।

जब भगवान विष्णु ध्यान योग में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु और उनका घर हिंम में पूरी तरह डूबने लगा। यह देखकर माता लक्ष्मी व्याकुल हो उठे। तब उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े होकर बेर के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगे।

माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप वर्ष और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गए। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी है तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तक को देखकर कहा कि हे देवी तुम ने भी मेरे ही बराबर तब किया है तो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे साथ पूजा जायेगा।

और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है, स्वाद से मुझे बदरीनाथ, बदरीनाथ के नाम से जाना जाएगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ा।

Importance of Badrinath Temple

चारधाम में से एक बद्रीनाथ के बारे में एक कहावत प्रचलित है जो जाए बद्री हो ना आये औदरी अर्थात जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे पुनः उदर यानी गर्भ में नहीं आना पड़ता है। मतलब दूसरी बार जन्म नहीं लेना पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य को जीवन में कम से कम दो बार बदरीनाथ की यात्रा जरूर करना चाहिए।

बद्रीनाथ के कपाट बंद होने के दौरान विशेष परंपरा है, मुख्य पुजारी स्त्री रूप में आता है

आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी को कपाट बंद होने के दिन स्त्री रूप धारण करना पड़ता है। पुरुष होने के बावजूद वे न सिर्फ स्त्री की तरह कपड़े पहनते हैं बल्कि उन्हीं की तरह श्रृंगार भी करते हैं।

आज हम इसका कारण भी जानेंगे और बद्रीनाथ के कपाट बंद होने की पूरी प्रक्रिया को भी समझेंगे। बद्रीनाथ के कपाट कब बंद होंगे इसकी तारीख विजयादशमी के दिन तय होती है।

रावल जी की राशि के आधार पर पंचांग को देखते हुए वो मुहूर्त निकाला जाता है। इस समय मंदिर को अगले छह महीने के लिए बंद कर दिया जाएगा। सामान्य रूप से नवंबर में बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं। बद्रीनाथ के कपाट बंद होने का मतलब सिर्फ मुख्य मंदिर के कपाट बंद कर देना नहीं है। मंदिर परिसर में स्थित अन्य मंदिरों के कपाट भी विधिवत रूप से बंद किए जाते हैं।

Badrinath Temple Inside

इसके लिए तारीखें भी अलग अलग होती है और प्रक्रिया भी, इस प्रक्रिया का नाम है पंच पूजा। यह प्रक्रिया बद्रीनाथ के कपाट बंद होने से 5 दिन पहले शुरू हो जाती है। इसमें सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है, उनका अभिषेक किया जाता है और गणेश मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

फिर गणेश जी की मूर्ति को बदरीश पंचायत यानी बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में विराजमान करा दिया जाता है। बद्रीनाथ जब आप जाएंगे तो आपको वहाँ वेद ऋचाओं का पाठ रोज़ सुनने को मिल जाएगा। ये यहाँ की एक प्रमुख विशेषता है। लेकिन कपाट बंद होने से 2 दिन पहले ही वेद ऋचाओं का पाठ बंद हो जाता है। वेद पुस्तकों की एक विशेष पूजा होती है और उन्हें सम्मान सुरक्षित रख दिया जाता है।

इससे पहले मंदिर परिसर (Temple Inside) में स्थित आदि केदारेश्वर मंदिर और आदि गुरु शंकराचार्य मंदिर के कपाट विधिवत रूप से बंद किए जाते हैं। आदि केदारेश्वर भगवान को विशेष रूप से अन्नकूट यानी पके हुए चावलों का भोग लगाया जाता है।

बद्रीनाथ के कपाट बंद होने की विशेष परंपरा

बद्रीनाथ(Badrinath) के कपाट बंद होने के दौरान की सबसे विशेष परंपरा है मुख्य पुजारी का स्त्री रूप में आना। इसके पीछे की वजह भी बेहद खास है। दरअसल, बदरीनाथ मंदिर परिसर पर ही बना है माँ लक्ष्मी का मंदिर। और जैसा कि आप जानते हैं, बद्रीनाथ के कपाट खुलते ही लक्ष्मी जी बदरीश पंचायत छोड़ देती है और अपने मंदिर में विराजमान हो जाती है। तो कपाट खुले रहने के दौरान लगभग छह महीने तक लक्ष्मीजी अपने मंदिर में ही विराजमान रहती है और जब कपाट बंद होने का समय आता है तो उन्हें बदरीश पंचायत यानी श्री हरि के निकट पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

ये कोई सामान्य रूप से लक्ष्मीजी की मूर्ति को उनके मंदिर से उठाकर बदरीनाथ के गर्भगृह में रखने का मामला नहीं है। दरसल यहा भक्त व देवताओं के बीच का एक गहरा आत्मीय संबंध है। बकायदा कपाट बंद होने से ठीक 1 दिन पहले लक्ष्मी जी को बदरीश पंचायत में विराजमान होने का निमंत्रण दिया जाता है और यह निमंत्रण लेके जाते है। बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी यानी रावलजी निमंत्रण मिलने के बाद ही माना जाता है कि लक्ष्मी जी बदरीश पंचायत में जाने की तैयारियां शुरू कर देती है।

बदरीश पंचायत

इसके बाद आता है बद्रीनाथ के कपाट बंद होने का दिन। क्योंकि बदरीनाथ के मुख्य पुजारी रावलजी, एक पुरुष होते हैं और लक्ष्मी जी को अपने हाथों से स्पर्श कर उठाना उचित नहीं माना जाता है। इस वजह से इस परंपरा को निभाने के लिए रावल बन जाते है लक्ष्मी जी की सखी यानी एक स्त्री वे एक स्त्री का वेश धरते हैं

और उसी के अनुसार सिंगार करते हैं? और सबसे बड़ी बात कि अपने हृदय में एक स्त्री रूप को आत्मसात करते हुए स्त्री के मनोभावों को लेकर वे पहुंचते हैं लक्ष्मीजी के मंदिर वो वहाँ शालीनता से श्री लक्ष्मीजी को अपनी गोद में उठाकर स्त्री रूपी रावल बदरीनाथ के गर्भगृह की तरफ आगे बढ़ते हैं और फिर उन्हें बदरीश पंचायत में विराजमान कराया जाता है।

अब अगले छह महीने तक लक्ष्मीजी इसी बद्रीश पंचायत में श्री हरिके सानिध्य में निवास करेगी। बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी का स्त्री रूप में आकर इस परंपरा को निभाना बेहद खास है। कपाट बंद होने की प्रक्रिया यहीं समाप्त नहीं होती और आगे भी बहुत कुछ होना शेष।

बद्रीनाथ का शृंगार

सामान्य दिनों में बद्रीनाथ जी का कई तरह के आभूषणों से शृंगार किया जाता है। आज भगवान के विग्रह यानी मूर्ति में सोने का मुकुट, कौस्तुभ मणि, हार मालाएं आदि देख सकते। लेकिन कपाट बंद होने के दिन उन्हें पूरी तरह से हटा दिया जाता है। इस दिन होता है फूलों से विशेष शृंगार। बदरीनाथ के गर्भगृह की हर एक चीज़ फूलों से सजाई जाती है। भगवान बदरी विशाल को फूलों का मुकुट पहनाया जाता है।

पूजा के बाद इसी मुकुट पहनकर रावल जी मंदिर की ओर मुँह करके पीछे की ओर चलते हुए अपने आवास पहुंचते हैं। अभिषेक के बाद श्री हरि के ऊपर से फूलों को भी हटा दिया जाता है मूर्ति पर गाय के घी का लेप किया जाता है और उसे चारों ओर से एक विशेष कंबल से ढक दिया जाता है। ये कंबल बद्रीनाथ के पास स्थित माणा गांव की कन्या तैयार करती हैं।

माना जाता है कि शीतकाल में जब पूरा क्षेत्र बर्फ से ढक जाता है तो ये कंबल भगवान को उष्मा प्रदान करेगा। ये प्रक्रिया भी भगवान और उनके भक्तों के आत्मीय रिश्तों को प्रदर्शित करती है। बद्रीनाथ के कपाट बंद होने पर बदरी विशाल की मूर्ति तो वही रहती है लेकिन कुछ अन्य देवी देवता दूसरे मंदिरों में विराजमान हो जाते।

गर्भगृह से कुबेर जी और उद्धव जी के विग्रह को सम्मान बाहर लाया जाता है और फिर इनकी डोली चल पड़ती है। पाण्डुकेश्वर की योग-ध्यान बदरी मंदिर की तरफ अब बद्रीनाथ के कपाट बंद रहने के दौरान अगले छे महीनों तक कुबेर जी और उद्धव जी की पूजा इसी योग ध्यान बदरी मंदिर में होगी।

इसके साथ ही बद्रीनाथ से शंकराचार्य की गद्दी उद्धव और कुबेर जी के साथ बने पाण्डुकेश्वर पहुंचती है। और फिर वहाँ से जोशीमठ के नृसिंह मंदिर मंदिर लाया जाता है कि कपाट बंद रहने के दौरान बद्री नारायण की पूजा नारद जी करते है, हालाकि मान्यता के अनुसार अन्य देवी देवता भी इस दौरान यहाँ आकर पूजा आराधना करते हैं।

कपाट खुलने के बाद बाद बद्री विशाल के विग्रह, यानी मूर्ति को स्पर्श करने का अधिकार बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी यानी रावल जी को होता है। इसके अलावा कोई भी व्यक्ति मूर्ति को स्पर्श नहीं कर सकता। अब अगले साल अप्रैल मई में बद्रीनाथ के कपाट दोबारा खुलेंगे और तीर्थयात्री बदरी विशाल के दर्शन कर सकेंगे।

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